आत्म सुधार

वर्तमान काल की एक बड़ी विडम्बना है - "दोहरा व्यक्तित्व"   और सच पूछा जाए तो यही कारण है मनुष्य के आध्यात्मिक पतन का।              
           सामान्य मानव जो  केवल पेट - प्रजनन तक सीमित है अथवा अपने लोभ, मोह तथा अहंकार की पूर्ति में संलग्न कुछ नरपिशाचों को तो छोड़ भी दिया जाय परंतु वे भी जो आत्म कल्याण अथवा लोक कल्याण के लिए प्रयत्नशील हैं उनमें भी "दोहरे व्यक्तित्व" की बीमारी गहरे जड़ जमाए बैठी है। आश्चर्य तो इस बात का है कि जो दूसरों के सुधार अथवा निर्माण की बात करते हैं वे भी बड़े अधिकार पूर्वक दोहरा जीवन जीते हैं।कथनी और करनी में भिन्नता के प्रतीक बन गए हैं। श्रीमद भागवत के अनुसार " पाखंड निर्ताह संतो विरक्ता सपरिग्रहा" बहुत स्पष्ट चहुं ओर दिखाई पड़ता है।  यही अन्तर्द्वन्द उनके शारीरिक,मानसिक तथा आध्यात्मिक विकृति का कारण है। कोढ में खाज़ की उक्ति तब चरितार्थ होने लगती है जब इस "दोहरे व्यक्तित्व" को छिपाने के लिए अलग - अलग स्वांग रचते हैं और वे भोले लोग सचमुच अध्यात्म पिपासु है, अपनी श्रद्धा - भावना  की प्रबलता के कारण इन हीन व्यक्तियों एवम् छलियों  के द्वारा छल लिए जाते हैं और जब उन्हें एहसास होता है तो उनकी आस्था को इतना गहरा आघात लगता है कि आध्यात्म, धर्म, ईश्वर के प्रति अभिमुख होने का उत्साह न केवल हत होता है बल्कि अधिकतर तो नास्तिकता की बेड़ियों में बंधकर अपना जीवन ही निष्फल कर लेते हैं।
        इस संदर्भ में मुझे " स्वामी रामकृष्ण परमहंस" के एक साधक शिष्य का निजी अनुभव याद आ रहा है। वे ध्यान की अवस्था  में अनुभूत विचारों को व्यक्त करते हैं-
            " यदि किसी व्यक्ति में शारीरिक विकृति हो तो सभी लोग उसे देख पाते हैं। उसी प्रकार यदि तुम में आध्यात्मिक विकृति होगी तो सभी लोग उसे अतः प्रेरणा से अपने आप जान लेंगे। क्योंकि जब तुम आत्मा की बात करोगे तब लोग यह अनुभव करेंगे कि को तुम कह रहे हो वह तुम्हारे हृदय की बात नहीं है। तुम उन्हें आध्यात्मिक जीवन का कुछ भी नहीं दे पाओगे क्योंकि तुम स्वयं आध्यात्मिक जीवन में प्रतिष्ठित नहीं हो, न ही तुम्हारे पास आध्यात्मिकता है। अतः तुम  परमात्मा के संदेशवाहक होना चाहते हो तो आत्मसुधार के प्रयत्न में लग जाओ।
                      (- समाधि के सोपान पुस्तक से)
  इसलिए पूज्य गुरुदेव ने कहा - " आत्म सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है "

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