मानव जीवन

आध्यात्मिक जीवन !   



 

                                                                                                                                                           

यूँ तो प्रत्येक मनुष्य जीवन जी ही लेता है ! परन्तु जीवन उसी का सार्थक तथा आनंदमय होता है  जो मानवीय गरिमा के अनुरूप जीवन जीता है | और इसके लिए आवश्यक होता है आध्यात्मिक जीवन जीना आध्यात्मिक जीवन अर्थात आत्मा के अधीन जीवन जीना | प्रायः लोग अपने इन्द्रियों के अधीन होकर अपना जीवन जीते हैं | इन्द्रियां अर्थात आँख, कान, नाक, मुहं,त्वचा आदि | केवल इन्द्रिय् तृप्ति हेतु जीवन जीने वाले सामान्य जीवन जी करके या यों कहे पशुवत जीवन जीकर  लीला समाप्त कर देते हैं |                                                                                                                                

 कुछ लोग अपना जीवन मन के अधीन जीते हैं, और मन की चंचलता तथा निम्नगामिता  से सभी परिचित हैं | मन का स्वभाव सहज ही पतन की ओर जाने वाला होता है | मन जब मनमानी करने पर उतरता है तो बड़े - बड़े  तथाकथित मनीषी भी नरपिशाच का जीवन जीने लगते है| रावण, कुम्भकरण, दुर्योधन , दुह्शाशन से लेकर आज  के बड़े बड़े आतंकवादी इसी श्रेणी में आते है | मन वो तृष्णा पैदा करता है जो कभी पूरी हो ही नहीं सकती |

 राजा भर्तृहरि ने कहा - "भोगो न भुक्ता वयमेव  भुक्ता तपो न तपता वयमेव  तप्ताः, कालो न याता वयमेव  याताः तृष्णा न जीर्णा वयमेव  जीर्णा |"

अर्थात - भोग को हम नही भोगते भोग हमको भोग लेते है , तप  को हम नही तपाते तप  हमको ही तपाते है है, काल को हम नही मारते काल ही  हमको  मारता है , तृष्णा कभी बूढी नही होती बूढ़े तो हम हो जाते हैं |   मन के अधीन जीने वाले ऐसे ही तृष्णा के चंगुल में फंसकर अपनी सारी सामर्थ्य और अपना सारा  समय, साधन, श्रम लगाकर भी खाली रह जाते है|  आत्मसंतोष प्राप्त नही होने के आभाव में पछताते और हाथ मलते रह जाते है |इतना ही नही अपनी असफलता का दोषारोपण दूसरों के सर मढ़ते है | कालहि कर्महि ईश्वर ही मिथ्या दोष लगाय वाली उक्ति इनके जीवन में चरितार्थ होती है | 


कुछ लोग बुद्धि के अधीन अपना जीवन जीते हैं। ऐसे लोगों का जीवन नितांत मतलबी होता है। "जियो और जीने दो" का दर्शन देकर "अपने लिए जियो" का ही सिद्धांत अपनाते  हैं। शहर में आग लगी हो  तो वे अपने घर के दरवाजे ये सोचकर बंद कर लेते हैं की हमे  क्या मतलब परंतु वे भूल जाते हैं की आग की लपट उनके घर को भी जला कर ख़ाक करने वाली है। ऐसे तथाकथित समझदार लोग जो प्रबुद्ध भी कहे जाते है| इनके मौन और चालाकी भी समाज में बुराई को पलने बढ़ने का एक बड़ा कारण है। क्या  ये नही जानते की शुतुरमुर्ग पक्षी की तरह रेत में सर छिपा लेने भर से शिकारी से बच नही सकते |                                                                                                                                     

 कुछ लोग आत्मा के अधीन जीवन जीते हैं | असल में आध्यात्म वादी इन्हें ही कहा जाता है | ये आत्मा की पुकार अनसुनी नही करते | बड़े से बड़े कष्ट आने पर भी ये आदर्शों के मार्ग को नही छोड़ते | राजा हरिश्चंद्र, भगीरथ, प्रह्लाद, नचिकेता, फ़तेह सिंह जोरावर सिंह, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, रानी लक्ष्मीबाई, पन्ना धाय और ऐसे  असंख्य आत्माएं इसी रास्ते को अपनाते हैं| इन अध्यात्म के मार्ग को चुनने वालों की संख्या बहुत बड़ी है और सच पूछा जाय  तो इनकी वजह से   हमारी संस्कृति भारतीय संस्कृति जिसको मानवी संस्कृति भी कहा जाता है, अमर  है और रहेगी |आत्मा के अधीन जीवन जीने वालों का रहन - सहन, खान -पान, वेश -विन्यास आम आदमी से आलग नही होता परन्तु ये अपने हर कार्य का संपादन  आत्मसाक्षी  भाव से करते हैं और इसलिए इनका जीवन निष्काम होता है | ये आलग बात है कि आज अध्यात्म के  सन्दर्भ में एक ऐसी मान्यता बना दी गयी है कि जो अध्यात्मवादी होगा वह गेरुआ वस्त्र पहनता होगा बाल दाढ़ी , जटा जूट अथवा बिना वस्त्रों के ही जीवन जीता होगा परन्तु अध्यात्म का वास्ता बाह्य जीवन से नही होता ये तो अंतरात्मा की पुकार पर जीवन जीने की कला है | ऐसा नही है की जटा जूट   बाल- दाढ़ी अथवा गेरुए वस्त्र में अध्यात्मवादी नही होते पर इस वेश- भूषा  का नाम अध्यात्म नही है | जब ऐसा अध्यात्मवादी दृष्टिकोण लेकर जीवन जिया जाता है तब मानव का जीवन आत्म संतुष्टि से भरा रहता है फिर ऐसे व्यक्ति के जीवन में न किसी के प्रति कोई शिकायत रहती न उनसे किसी को शिकायत होती है |                                           

ऐसे जीवन के लिए भगवन ने गीता में कहा है-                                                                                                                                            " संतुष्टम  सततम् योगी यतात्मा दृढ निश्चयी , मय्यार्पित मनोबुधिर्यो मद्भक्तः स में  प्रियः | "                                                            

 ऐसा मनुष्य सदा संतुष्ट रहने वाला योगी तथा भगवन का प्रिय पात्र होता है | सही अध्यात्मवादी इन्हें ही कहा जाता है | यही है आध्यात्मिक जीवन जो हमारे आनंद का कारण भी होता है |

Comments